राजभाषा कहलाए हिंदी मगर राज करे अंग्रेजी

-यज्ञ शर्मा

            मुंबई, २१ अक्तूबर (प्रभासाक्षी) । लोग कहते हैं कि हिंदुस्तान की राजभाषा हिंदी है। होगी! पर राज तो यहां अंग्रेजी का चलता है। हिंदी में तो बस अनुवाद होता है। ऊपर से उस अनुवाद का मखौल उड़ाया जाता है। मखौल भी कुछ इस अंदाज में कि जैसे जो अंग्रेजी जानता है वह ज्यादा ज्ञानी होता है। अगर हिंदी के बजाय अंग्रेजी राजभाषा होती तो ?

            अंग्रेजी राजभाषा होती तो सभी सरकारी कार्यालयों में अंग्रेजी विभाग खोले जाते। हिंदी अधिकारियों की तरह अंग्रेजी अधिकारी नियुक्त किये जाते। हर साल अंग्रेजी दिवस मनाया जाता। संस्था का मैनेजिंग डायरेक्टर, अपना अंग्रेजी भाषण, अंग्रेजी अधिकारी से लिखवा कर अंग्रेजी दिवस पर अपने दफ्तर के कर्मचारियों को सुनाता। कर्मचारी वैसे ही बोर होते जैसे आज होते हैं। भाषा बदलने से कोई आदमी रोचक नहीं हो जाता। श्रोता बोर होते तो उनके मनोरंजन के लिए हास्य कवि सम्मेलन किये जाते। लालू यादव हिंदी के हास्य कवियों के प्रिय पात्र हैं, अंग्रेजी वालों के बिल क्लिंटन होते। वैसे लालू अंग्रेजी हास्य कवियों को भी अच्छे लगते। क्योंकि आजकल लालू अंग्रेजी बोलने लगे हैं। लगता है लालू, प्रधानमंत्री बनने की तैयारी कर रहे हैं। लालू समझ गये हैं कि अगर हिंदुस्तान का प्रधानमंत्री बनना है तो अंग्रेजी बोलना बहुत जरूरी है।

            अंग्रेजी राजभाषा बन जाएगी तो सबको पता चल जाएगा कि हिंदुस्तान में अंग्रेजी का ज्ञान कितना है। जैसे अभी हिंदी में अनुवाद होता है, वैसे ही अंग्रेजी में हुआ करेगा- शब्दकोश देख कर। जैसी गड़बड़ आज हिंदी के अनुवाद में होती है, वैसी अंग्रेजी के अनुवाद में भी होगी। आज लोग अनुवाद की हिंदी पर हंसते हैं, तब अनुवाद की अंग्रेजी पर हंसेंगे।

            हिंदुस्तानी अंग्रेज, नैकटाई को 'कंठ लंगोट' और कॉकटेल को 'मुर्गे की पूंछ' बोल कर हिंदी पर हंसते हैं। इनको कोई कैसे समझाये कि कोई भाषा कमजोर नहीं होती। कमजोर होता है उसको इस्तेमाल करने वाला। अच्छा अनुवाद करने के लिए दोनों भाषाओं का अच्छा ज्ञान आवश्यक है। हिंदी अनुवादक तो जैसी भी अंग्रेजी जानता है, जानता है। क्या अंग्रेजी जानने वाले यह दावा कर सकते हैं कि जितनी अंग्रेजी हिंदी अनुवादक जानता है, अंग्रेजी वाले भी उतनी हिंदी जानते हैं? इसलिए जब अंग्रेजी की बारी आएगी तो उसके अनुवाद में कैसे-कैसे नमूने देखने को मिलेंगे इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है।

            पुरानी हिंदी फिल्मों में एक मशहूर हास्य कलाकार थे मिर्जा मुशर्रफ। अजीबोगरीब अंग्रेजी बोलना उनकी खासियत थी। उनका एक संवाद मुझे आज तक याद है- 'माई हैड इज ईटिंग सर्कल्स! मेरा सर चक्कर खा रहा है।' ऐसे मजाक और भी हो सकते हैं- 'आई हैव टु यलो माई डॉटर्स हैंड्स- मुझे अपनी बेटी के हाथ पीले करने हैं।' और 'यू डोन्ट वरी मम्मी, आई विल रीपे द लोन ऑफ एवरी ड्रॉप ऑफ योर मिल्क- तू फिक्र मत कर मां, मैं तेरे दूध की एक-एक बूंद का कर्ज चुका दूंगा।' जी हां, यह भौंड़ा मजाक है, पर उतना भौंड़ा नहीं, जितना अंग्रेजीदां लोग 'कंठ लंगोट' बोल कर हिंदी के साथ करते हैं।

            अंग्रेजी विश्वव्यापी भाषा है। बड़ी समृद्ध भाषा है। मगर हिंदुस्तान के अंग्रेजों को उस पर ज्यादा गर्व नहीं करना चाहिए। क्योंकि वह उधार की भाषा है। और उधार के बल पर अकड़ने वालों को यह याद रखना चाहिए कि अंग्रेजी की किस्मत अच्छी है कि वह हिंदुस्तान की राजभाषा नहीं बनी। वरना उसकी हालत भी वैसी ही होती जैसी हिंदी की हो गयी है। वह भी वही बना दी जाती जो हिंदी को बना दिया गया- अनुवाद भाषा। अनुवाद में अनुवाद करने वाले का चरित्र झलकता है। और जहां तक चरित्र का सवाल है, हिंदुस्तान के अंग्रेज कोई दूध के धुले नहीं हैं। नॉट वॉश्ड इन मिल्क, यू सी!