गांधीजी ने डांटा था-अपनी मातृभाषा में नहीं लिखते ?
स्व. मुल्कराज आनंद
अनुवादक- घनश्याम रंजन


अपने लेखकीय जीवन की पृष्ठभूमि में झांकते हुए मैं देखता हूं कि सच्चे प्रेम की कविताएं लिखने और अखबारों-पत्रिकाओं में छपने की इच्छा पूरी करने और सुंदर दार्शनिक टिप्पणी के किस्म की कुछ रचनाओं के बाद मेरे जीवन में निर्णय की एक ऐसी घड़ी आई जो मेरे लिए मानवीय अनुभव की वास्तविकताओं का सामना करने, सहृदयता, सादगी का पल्ला पकड़ने की ओर मुड़ने में मेरी सहायक हुई।

निर्णय की घड़ी! मैंने १९२७ में देश लौटने का और गांधी जी के साबरमती आश्रम में जाकर रहने का निर्णय किया। मैंने एक भंगी लड़के, 'बाखा' के बारे में एक उपन्यास लिखा था। मेरा नायक सीधा सादा, भोला भाला कवि था जिसे सभी नीच जाति का होने के कारण घृणा से देखते थे। इन दिनों मैं जेम्स ज्वायस की शैली से बहुत प्रभावित था। पर मैं अपनी सहेली आर्टिस्ट इरीन रीस से मिलने के लिए आयरलैंड गया था। वह आइरिश विद्रोह की वीरांगना, माड गोने के साथ काम कर रही थी। यहां मुझे जेएम सिंज और लेडी ग्रेगोरी के लोक नाटक देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, वे किलारताई नामक नई आइरिश- अंग्रेजी भाषा में पुन: लिखे गये थे। मुझे लगा कि अपने हिन्दुस्तानी नायक के लिए उपयोग की गई मेरी अंग्रेजी भाषा वास्तविकता से कहीं दूर है, अवास्तविक है, झूठी है। अपने इस उपन्यास का नाम तब मैंने 'बाखा' रखा था।

मैंने अपना 'अनटचेबल' उपन्यास समाप्त किया तो संकट गहरा हो गया। इसमें मैंने जेम्स ज्वायस के उपन्यास, 'यूलेसिस' से प्रभावित होकर नये-नये शब्द गढ़ने की तकनीक का चुस्ती से उपयोग किया था। मुझे अपने अनेकों वाक्यांशों में खोखली टंकार का अहसास होता, पर मेरा अल्हड़ घमंड अपने मन की आवाज सुनी-अनसुनी करने का कारण बनता। एक दिन मैंने गांधी जी के साप्ताहिक 'यंग इंडिया' में उनकी 'रूका' रचना पढ़ी। यह भी एक भंगी लड़के की वार्ता थी। मैंने देखा जहां गांधी जी सादगी से, अ-साहित्यिक पर हू-बू-हू तस्वीर खींचने वाले वास्तविक शब्दों से मामले की तह तक पहुंच गये थे, वहां मेरा पात्र 'बाखा' किसी झूठे-चिंतन की धुंध में लिपटा हुआ, और एक ऐसी चेतना की धारा में ग्रस्त था जो मेरे सीधे-सादे नायक की रचना से खुद मेरी रचना के दर्शन के विद्यार्थी की रचना से कहीं अधिक अनुकूल था।

मेरे सामने निर्णय की घड़ी थी। मैंने गांधी जी को लिखा कि मैं उनसे मिलना चाहता हुं वह दो महीने की अवधि में मुलाकात के लिए कोई समय निकालने का कष्ट करें। मैं गांधी जी का उत्तर पढ़ कर हैरान ही रह गया। उन्होंने १४ अप्रैल को शाम को ४ बजे का समय दे दिया था।

मैंने किराये के लिए धन उधार लिया और समुद्री जहाज में सीट बुक करवा ली।

मैं ब्रिटिश जहाज पर निरादर युक्त अनुभव के बाद, जिस प्रकार उन दिनों हिन्दुस्तानियों का वास्ता पड़ता था, १३ अप्रैल को बंबई पहुंचा। मैं उसी दिन रात की गाड़ी पकड़ कर अहमदाबाद पहुंचा, तीसरे दर्जे के डिब्बे में, अपने देश के लोगों के साथ, पशु की भांति ठूंसे हुए, जैसे हम मनुष्य न होकर पशु हों।

मैं कार्ड्राय का सूट पहने था, और मैंने अपने अंग्रेजी स्टाइल के लिबास का लाभ उठाते हुए प्रथम श्रेणी के वेटिंग रूम में मुंह हाथ धोने की कोशिश की। पर टिकट कलेक्टर मेरे रंग से ही ताड़ गया कि लगता था कि मैं सचमुच का फर्स्ट क्लास का यात्री नहीं हूं, और उसने मुझे वहां से निकल जाने को कहा। मैंने देखा, वहां कुछ ब्रिटिश टामी फौजी जैसे थर्डक्लास के फौजी-डिब्बे के यात्री थे, गुसलखानों में शावरों के नीचे एकदम नंगे होकर नहा रहे थे। और मैं इन गोरे साहबों के लिए एक तरह से अछूत ही तो था।

मैंने नगर का रास्ता लिया, ऊंची मस्जिद के पास एक मुस्लिम रेस्टोरेंट में शाकाहारी भोजन किया, एक वृक्ष के नीचे आराम किया, और फिर तांगा लेकर साबरमती आश्रम पहुंच गया। मुझे महात्मा गांधी से मिलाने के लिए ले जाया गया, तो मैंने देखा वह अपने पेट पर गीली मिट्टी की टिक्की रखे काठ की चारपाई पर लेटे हुए थे। उन्होंने मुझे पास में रखी एक चटाई पर बैठने के लिए संकेत किया।

'तुम्हें इन गर्म कपड़ों में गर्मी नहीं लगती?' गांधी जी ने मुझसे पूछा।

मैंने अभी सोचा ही नहीं था क्या उत्तर दूं, कि उन्होंने पूछा, 'तुम्हें बंदर की तरह दिखना क्यों पसंद है?'

मैंने घमंडी पंजाबी ब्राउन साहब की तरह प्रतिक्रिया दिखाई, जैसा कि मैं बन गया था, और कहा।

'आप भी तो कभी अपने लम्बे कोट और धारीदार पाजामे में ऐसे ही लगते थे।'

मैं अपनी गुस्ताखी को भर्माने के लिए मुस्कुराया, 'जाओ, सूट उतार कर कुर्ता-पाजामा पहन लो, तब फिर इतना पसीना नहीं निकलेगा।' यह कहकर उन्होंने अपने पास खड़े तगड़े से व्यक्ति से कहा, 'महादेव, अपना एक जोड़ा इन्हें दे दो।'

मैं अपने मांगे हुए पंख उतार कर, कुर्ता पहन कर गांधी जी के पास लौटा। ये कपड़े महादेव ने एक लड़के से लिये थे, उसका नाम ऊका था। यह मुझे बाद में पता लगा था।

गांधी जी ने अपनी ऐनक के ऊपर से मुझे निहारा।

'मेरी जरूरत तुम्हें कैसे पड़ गई?'

'मैं आपको अपना उपन्यास दिखाना चाहता हूं।'

'उपन्यास?'... यह किसी लड़के-लड़की के प्रेम के बारे में है?'

'नहीं। यह तो प्रेम के बारे में है- पर आपकी तरह के प्यार के बारे में!'

'मेरा प्रेम किस प्रकार का है?'

'यह एक अछूत की कथा है।' मेरी आवाज भर्राई हुई थी।

'तुम्हारा मतलब हरिजन से है?'

'हां, हरिजन।' मैंने अपने को सुधारा।

'ओह, तब तुम छूत-छात के बारे में एक सीधी पुस्तिका ही क्यों नहीं लिख देते? उपन्यास ही क्यों?'

'मैं प्रचार करना नहीं चाहता... नैतिकता के बारे में भाषण देने वाला भला मैं कौन होता हूं। मैं तो अपने भंगी लड़के को वैसे ही एक इंसान के तौर पर दर्शाना चाहता हूं, जैसे आपने ऊका को दर्शाया है। और तरस, करूणा, जगाना...'

'तो फिर तुमने बुद्ध को पढ़ा है?' गांधी जी इस बात से हैरान थे कि मैंने हिंदुस्तान से अपना नाता कायम रखा है।

वह चुप रहे। फिर ऐनक के ऊपर से मेरी ओर देखा, शायद यह जानने के लिए कि मैं कहां तक सहृदय हूं, और बोले, 'तुम यहां रह सकते हो, पर तीन कसमें खानी पड़ेंगी।'

मैंने झिझकते हुए, सिर झुकाए-झुकाए ही उनकी ओर देखा।

'यहां चाहत से महिलाओं की ओर नहीं देखोगे...'

'पर मैं रात को सपनों में अपनी सहेली के सपने तो देख सकता हूं न!'

'हां, रात को उसके सपने देख सकते हो, पर दिन में इसके बारे में मत सोचना।' गांधी जी ने कहा।

मुझे यह सुन कर हंसी सी आई। महादेव के भरे-भरे चेहरे पर भी मुस्कराहट खिल गई थी।

'तुम पीना नहीं।'

'ठीक... यहां आश्रम में नहीं, पर लंडन की पबों में पियूंगा ही...'

'अच्छा, लंडन जा कर पी सकते हो, यदि तब तक तुमने पीना छोड़ ही न दिया हो तो...'

'और तीसरी?'

'तुम्हें हफ्ते में एक बार टट्टी साफ करनी होगी।'

'मैं करूंगा?' मैं सहमत था।

'मैं वास्तव में हरिजन की भांति रहना चाहूंगा।'

उनके चेहरे का तनाव कम हो गया और वह नर्म हो गये।

'इनका डेरा ऊका के बगल वाली कॉटेज में लगवा दो, मेहमानखाने वाली में।' उन्होंने महादेव देसाई से कहा।

'क्या कल सुबह से मैं आपको अपना उपन्यास सुना सकता हूं?'

'मैं इसके लिए हफ्ते में एक घंटा दूंगा। और सुबह ही श्रीगणेश कर देंगे। ठीक-ठीक समय महादेव बता देगा।'

महादेव मुझे एक छोटे से कमरे में ले गया। उसमें खाट के अतिरिक्त एक लिखने वाली मेज भी थी, और उसमें गुसलखाना भी।

दूसरे दिन निर्धारित समय पर गांधी जी ने मुझसे प्रारम्भ के पांच पृष्ठ सुने और बोले, 'यह सब एक ही पन्ने में कह डालो। और आडम्बर जैसे शब्द बिलकुल न इस्तेमाल करो। फिर, अपनी मातृभाषा में क्यों नहीं लिखते!'

'मैं मातृभाषा भूल गया हूं। फिर, पंजाबी में प्रकाशक नहीं हैं।'

'अच्छा, चाहे जिस भाषा में लिखो, पर यह याद रखना कि तुम्हारा भंगी बुद्धिजीवी नहीं है।'

'जबरदस्ती का बुद्धिजीवी।' मैंने स्वयं ही अपनी हंसी उड़ाई।

यह गांधी जी को अच्छा लगा।

'टॉल्सटाय पढ़ा है?' उन्होंने पूछा।

'हां, पर इंग्लैंड में रूसियों को कम पढ़ा जाता है। अंग्रेज टॉल्सटाय को बोझिल समझते हैं।

'नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है, महादेव इन्हें 'मोइआं दी जाग' पढ़ने को दो।'

मेरे पूर्वअनुमानों की कि मैं ज्वायस से बहुत अधिक प्रभावित हूं, पुष्टि हो गई। सो, मैं अपना उपन्यास सरल शैली में लिखने लगा, पंजाबी में अनुभव करता और सोचता और फिर उसे अंग्रेजी में अनुवाद करता, और मातृभाषा, पंजाबी के कुछ प्रकटाने वाले प्रभावशाली शब्द वैसे के वैसे ही रख देता। और मैंने स्वयं को अपने पंचनद की धरती के वातावरण में निरूपण किया, हर प्रकार के साहित्यिक, आडम्बरपूर्ण लच्छेदार शब्दों, वाक्यांशों से बचने की कोशिश की। वास्तव में मैंने स्वयं को अपने नायक के साथ एकात्म किया, उसकी गंदगी और मैल से खत्म कर लिया और उसी की तरह हीर का वह बंद गुनगाने लगा, और यह डर छोड़ दिया कि मध्यवर्गीय अंग्रेजों के लिए अकथनीय शब्दखकगी का कारण बनेंगे। मैंने बाखा के चिंतन में प्रवेश करने का यत्न किया। मैं उसके जैसा ही निर्बल, उसके जैसा ही दुविधाग्रस्त, संकोची, हीन और डरपोक बन गया और सब मानने लगा वास्तव में, मैं इस नायक के अल्हड़ अनुभवों और अहसासों से एकसुर हो गया। वह वास्तव में अनायक था, उसे अपनी बेइज्जती और निरादर वाली स्थिति का कुछ-कुछ ही ध्यान था, पर जब कोई उच्च जाति का हिन्दू व्यंग्य करता तो उसे अपने अस्तित्व का ध्यान आने लगता। मुझे अब सभी पीड़ित और तिरस्कृत लोगों के विषय में घोर सत्य और उजागर करने की कोशिश करनी थी। और इसी तरह ही मैं दुर्बोध दार्शनिकों की विधि से बच सकूंगा, और मनुष्य के दर्शन को स्पर्श कर सकूंगा।

अगले तीनों महीनों में मैंने उपन्यास पुन: लिख लिया। तीन सौ पृष्ठों को डेढ़ सौ में समेट लिया। यह गांधी जी के परामर्श का ही परिणाम था।

मैंने पुन: उपन्यास लिखते समय स्वयं में परिवर्तन होता अनुभव किया। ब्लूमजबरी वासी के स्थान पर हिन्दुस्तानी मनुष्य बन रहा था। और रचनात्मक लेखनी मेरे लिए जिंदगी का प्रकटीकरण बन गई, यह स्वयं के लिए ही केवल धुनि अनुकरणात्मक कथा नहीं रही थी। मेरा उपन्यास तो मेरी आदिकालीन चेतना, अपने नायक की होनी के साथ मेरी खबर की उपज थी। मैं आरम्भ से अंत तक उसका हम सफर रहा, उसके साथ-साथ रहा। उसकी जातीय अचेतन मन के निम्न सचेतन जगत से उसकी असंतुष्टता की, उसके चेहरे पर कभी-कभी चमकती मुस्कान की, और उसकी आंखों में धुंध के पीछे जो कुछ था, उसका मुझे ज्ञान हुआ। वास्तव में मैंने अछूत की निराशा के धुर भीतर झांक कर देखा। इन लोगों की दबी हुई आत्माओं की सजीवता से, अपना बाबूपन छोंके पर टांग कर उनके जैसा बनने के योग्य करके मैं जैसे एक गरीब परिवार में जन्मा-पला था- अति अधम, नीचों का नीच, बच्चे जिनके साथ मैं बचपन में खेला था, उनकी चेतना का भागीदार बनने के कारण मुझे वही हिंदुस्तानी बनना था जैसा मैं कभी हुआ करता था। मैं तो अब सुशिक्षित लोगों में अलग तरह के लोगों की चेतना के बारे में और नये उपन्यास लिखूंगा। ऐसे उपन्यास जो अभी तक लिखे नहीं गये हैं। मैं एक सीधा-सादा कवि बनूंगा। मैंने बाखा के दु:खों, मुसीबतों के आगे स्वयं को इतना तुच्छ सा अनुभव किया जैसे मेरी कल्पना ने उसके आचरण का कायाकल्प करते हुए स्वयं का कायाकल्प कर दिया हो। वह मेरे उपन्यास में जैसे उस त्रासदी काल में हम सब का ही बिम्ब बन गया हो- अछूत। इसीलिए मैंने उपन्यास का नाम 'अनटचेबल' (अछूत ) रखा।

गर्मियां बीतने पर मैं इंग्लैंड लौटा और अपना उपन्यास वहां कई प्रकाशकों के भेजा।

उन सभी ने मेरी किताब प्रकाशित करने से मना कर दिया। मुझे मालूम पड़ा कि उनकी दृष्टि में यह 'गंदी', 'बकवास' और 'अश्लील' थी। अंग्रेज यह सहन नहीं कर सकते कि मैले-कुचैले कपड़ों में कोई आदमी उनके घर में प्रवेश करे। क्या उन्होंने स्वयं गांधी जी को भी 'फकीर!' लम्बे कोट वाला आदमी, जो जगह-जगह राजद्रोह का प्रचार करता फिरता है!' 'काली आत्मा वाला काला आदमी!' नहीं कहा था। उन्हें मेरी भी जरूरत नहीं थी, क्योंकि मैंने कोई मुलायम पुस्तक नहीं लिखी थी। मैंने जैसे लिखा था वह उनकी आत्म मुग्धता में खलबली मचा सकती थी। उनके तअस्सुब को खफा कर सकती थी, उस शानदार सल्तनत के मिथक को- कि ब्रिटिश साम्राज्य में सूरज कभी नहीं डूबता है। भद्दा यथार्थ उन्हें हांट करता, डराता।

उन्नीसवें प्रकाशक के मना करने पर, मेरा मन किया कि आत्महत्या कर लूं।

मेरा एक कवि मित्र मेरी पाण्डुलिपि बीसवें प्रकाशक के पास ले गया। उसने कहा कि अगर ईएम फोर्सटर इसकी प्रस्तावना लिख दे तो वह प्रकाशित कर देगा। मैं मार्गन फोर्सटर को कुछ-कुछ जानता था, पर झिझक रहा था।

मेरे कवि मित्र दिल कड़ा करके पाण्डुलिपि ले कर उससे मिलने पहुंच गया।

'ए पैसेज टु इंडिया' का लेखक, जो अकड़बाज अंग्रेजों को डरपोक, आज्ञाकारी हिंदुस्तानियों से टकराने को दिखाकर पहले ही ब्रिटिश मध्य वर्ग को नाराज कर चुका था, भूमिका लिखने को राजी हो गया।

उपन्यास प्रकाशित हो गया और इसका पहला संस्करण शीघ्र ही बिक गया। यद्यपि कई समीक्षकों ने मेरे जैसे बदनाम लेखक की हौसला अफजाई करने के कारण फोर्सटर के लिए खराब शब्दों का उपयोग किया था।

पर मैंने समझ लिया कि हवा का रुख मेरी ओर है, कि लंडन, पेरिस और न्यूयॉर्क में नये तरह का उपन्यास प्रगट हो रहा है। प्रज्वलित उपन्यास कि फासिज्म की हिंसा के सन्मुख जो यूरोप में जोर पकड़ रहा था रूपवादी किस्म का क्लासिकल साहित्य एक ओर हटाया जा रहा है। सच, जिसका पक्ष टॉल्सटॉय, रस्किन और गांधी ने लिया था, उसे सुना जाने लग गया है।

मैंने फिलासफी पढ़ाना छोड़ दिया ताकि दूसरा उपन्यास लिख सकूं- मैंने तीसरा उपन्यास लिखा, चौथा लिखा।

मैंने उच्च तबकों के इतिहास की महफूज शाहरा है छोड़ते हुए, खतरनाक राह पकड़ने की हिम्मत की थी। मुझे इसी राह पर डटे रहना था।

गांधी जी से मिलने को जाने का मेरा निर्णय एक लेखक की हैसियत से मेरे जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ। मैं अब परम्परागत दर्शनवेत्ताओं के मुर्दा विचारों, पुराने धर्मों की रीति रिवाजों, या प्रोफेसर के अर्थ-विज्ञान को स्वीकार नहीं करता था। मुझे तो सभी प्राचीन रूपों को तोड़ मरोड़ कर फेंकना था, नये रूपों का सृजन करना था। मैं अन्य लोगों के शब्द दुहराने वाला शांत दार्शनिक नहीं बनना चाहता था। मुझे तो शायर इकबाल की भांति जलना और पिघलना था। मैं जो था मुझे वही बनना था- एक सीधा सादा कवि, पंजाब की मिट्टी की सुगंध वाला। जो हो सो हो मुझे तो अपने वतन की ओर, अपनी जन्मभूमि की ओर मुड़ना था, शाही मेज से बचा-खुचा खाने वाला अजनबी नहीं बनना था, अपितु गुरू नानक का मुरीद बनना था।

(प्रभासाक्षी, नई दिल्ली ०९ मार्च २००६ से साभार)