हिंदी के नाम पर कब तक मनेगा पाखंड का पखवाड़ा

संजय स्वतंत्र

            वैश्विक अर्थव्यवस्था के विशाल बाजार के रूप में उभरे भारत की ओर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के रूख किया था तब एक सौदागर के रूप में उसकी भाषा अंग्रेजी थी। लेकिन इस भाषा में ये विदेशी कंपनियां करोड़ों उपभोक्ताओं से संवाद बनाने में असफल रहीं। उसे जल्दी अहसास हो गया कि यहां अपने उत्पाद बेचने के लिए हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं को संवाद का माध्यम बनाना होगा। देर सवेर भारतीय कंपनियों को भी यह समझ में आ गया। अब सवाल यह है कि जब हिंदी बाजार की भाषा हो सकती है तो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में लोक की भाषा की राजकाज में इतनी उपेक्षा क्यों?

            एक ओर विदेशी कंपनियां अंग्रेजी का मोह त्याग कर उपभोक्ताओं से सीधे उन्हीं की भाषा में जुड़ रही हैं। वहीं भारत की शासन व्यवस्था अंग्रेजी के मकड़जाल में फंसी है। बाबू से लेकर नौकरशाह तक इस बंद सांकल को नहीं खोलना चाहते। और तो और लोक की भाषा में वोट मांग कर संसद की चौखट तक पहुंचने वाले कई नेता भी हिंदी में बोलने से कतराते हैं। शायद उन्हें राजा और प्रजा का भेद मिट जाने का डर लगता है।

            सरकारी तंत्र में राजभाषा को लागू कराने के लिए तैनात बाबू से लेकर अफसर तक सत्ता की महारानी बन चुकी अंग्रेजी के सिंहासन के बगल में हिंदी को कुछ दिनों के लिए बैठा कर बेशक प्रसन्न होते हों मगर यह उन्हें भी मालूम होता है कि रस्मी समारोह खत्म होते ही इस पाखंड का मुलम्मा उतर जाएगा। और हिंदी में काम करने के नारे और पोस्टर बनाने वाले कर्मचारी हमेशा कही तरह ढर्रे पर लौट आएंगे। जाहिर है सरकारी बाबूओं का न तो हिंदी से कोई सरोकार है और न ही इसमें काम करना उनकी मजबूरी। दुनिया में ऐसा कोई राष्ट ्र नहीं होगा जो अपनी राष्ट्रभाषा को लेकर इतना बड़ा पाखंड करता हो। विश्व के सबसे विशाल लोकतंत्र के हम स्वाभिमानी नागरिक बहुत ही बेशर्मी से हर साल इस पाखंड के पखवाड़े को मनाए जाते देखते हैं।

            संविधान बनाए जाते समय ही हिंदी की बेकद्री न होती तो आज हिंदी दिवस जैसे कर्मकांड नहीं होते। किसी भी राष्ट ्र का एक राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान और एक राष्ट्रभाषा होती है। हम अपने राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान पर तो गर्व करते हैं मगर राष्ट्रभाषा की उपेक्षा देख कर हम सभी को मन में कोई पीड़ा नहीं होती। संविधान में हिंदी को राजभाषा का तो दर्जा दिया गया पर राष्ट्रभाषा की बात राष्ट्रीय अस्मिता के संदर्भ में ही रखी गई। संविधान निर्माताओं में से एक डा० भीमराव अंबेडकर की यह बात अनसुनी ही रह गई कि 'एक राज्य की एक ही भाषा होनी चाहिए।'

            निश्चित तौर पर एक स्वाधीन देश की अपनी एक भाषा होती है तो लोगों की जुबान और बाजार से होती हुई राजकाज की भाषा बनती है। हमारे सामने चीन, रूस और जापान सबसे बड़े उदाहरण है जिन्होंने वैश्विक उदारीकरण की आंधी में भी भाषाई अस्मिता सहेज कर रखी और अपनी जुबान पर विदेशी रंग नहीं चढ़ने दिया। जर्मनी, फ्रांस और इटली को ही लें, वे भी एक राज्य और एक भाषा के सिद्धांत पर अमल करते हैं। तुर्की जब आजाद हुआ तो एक हफ्ते में वह विदेशी भाषा के चंगुल में भी मुक्त हो गया था। मगर हम आजादी के छह दशक बाद भी अग्रेजी की दासता को गले में सांप की तरह लटकाए घूमते हैं और खुश भी होते है।

            फिर हिंदी पखवाड़ा मनाने का औचित्य क्या है? सभी जानते हैं कि केंद्र और राज्यों की राजकाज की भाषा क्या है। यह सच है कि संविधान के अनुच्छेद ३४३ के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी है। लेकिन यह विडंबना नहीं है कि जिस भाषा को वास्तव में राजभाषा का दर्जा हासिल है, काम उसमें नहीं बल्कि उस विदेशी भाषा में होता है जिसे संविधान निर्माताओं ने कोई दर्जा ही नहीं दिया। आज स्थिति यह है कि किसी भी विभाग में सारा काम पहले अंग्रेजी में होता है फिर उसका हिंदी अनुवाद होता है। जाहिर है फिर हिंदी राजभाषा कहां रह जाती है।

            दरअसल दफ्तरों में हिंदी के प्रयोग के लिए संसद में १९९३ में पास राजभाषा अधिनियम राजकाज में हिंदी के इस्तेमाल में सबसे बड़ी बाधा बना। संविधान बनाते समय यह लगभग तय था कि अभी हिंदी और अंग्रेजी साथ-साथ चले और पंद्रह साल बाद हिंदी राजकाज की एकमात्र भाषा बन जाए। मगर १३ अप्रैल १९६३ को संसद में राजभाषा अधिनियम तमाम विरोधों के बावजूद पेश किया गया। नतीजा यह निकला कि अंग्रेजी सत्ता की भाषा बन गई। और हिंदी राजभाषा के नाम पर अनुवाद की भाषा बन कर रह गई। हालत यह है कि राजभाषा अधिनियम की आज जितनी अनदेखी होती है, उतनी किसी अधिनियम की शायद ही होती है।

            संवैधानिक दर्जा हासिल होने पर भी हिंदी अंग्रेजी के दबदबे में सहमी दिखाई देती है। इसका इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि संसद में सवाल के दौरान संबंधित विभाग से अंग्रेजी में जवाब मिलने पर कोई यह नहीं पूछता कि इसे हिंदी में क्यों नहीं दिया गया। यह है हिंदी की संवैधानिक स्थिति! किसी हिंदी समर्थक सदस्य ने सवाल उठा ही दिया तो हड़बड़ी में मंत्रालय के आला अधिकारी जैसे-तैसे हिंदी में जवाब भिजवा देते हैं। नतीजा यह कि उसमें कई त्रुटियां और अशुद्धियां रह जाती हैं फिर यही अंग्रेजी समर्थक राजभाषा पर उंगलियां उठाते हैं। यह भी कहा जाता है कि हिंदी में काम करना बहुत मुश्किल है। नतीजा यह निकला कि भारत सरकार में हिंदी में काम राजभाषा कक्ष तक ही सिमट कर रह गया है।

            सरकारी कामकाज में हिंदी का प्रयोग बाध्यता नहीं, मजबूरी है और जो काम मजबूरी में करना पड़े, वह हमेशा अनमने ढंग से ही होता है। जाहिर है ऐसी स्थिति में सरकारी कामकाज की जो शब्दावली बन गई है, वह कुछ ज्यादा ही विशिष्ट और राजसी है। इसलिए वह आम बोलचाल की दूर अलंकृत और प्राय: असहज लगती है। इससे अंग्रेजी पृष्ठभूमि से तैयार हो रहे युवा अधिकारी हिंदी में मामूली नोट या टिप्पणी लिखने से कतराते हैं। लेकिन बड़े अधिकारी अड़ जाएं तो मौलिक रूप से हिंदी में काम शुरू होते देर नहीं लगेगी।

            दरअसल हिंदी को सत्ता की भाषा बनाने के लिए कमाल पाशा की तरह प्रशासनिक और राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। जिस दिन एक राज्य एक भाषा को सिद्धांत बना कर देश का कोई प्रधानमंत्री हिंदी को राजकाज की भाषा बनाने की ठान लेगा, उसी दिन से हिंदी दिवस मनाने की जरूरत नहीं रहेगी और बरसों से चले आ रहे पाखंड का भी अंत हो जाएगा। (प्रभासाक्षी १४ सितंबर २००६ से साभार) ।