वेबसाइट हिंदी में है तो डोमेन नेम अंग्रेजी में क्यों ?

          नई दिल्ली, २३ सितंबर २००६ (बालेन्दु दाधीच) । इंटरनेट पर अंग्रेजी के प्रभुत्व का घोर ऒर मुखर विरोधी मेरा एक मित्र अपने स्वयंसेवी संगठन की वेबसाइट बनवाना चाहता था। वह अंग्रेजी के पूरी तरह खिलाफ था ऒर अपनी वेबसाइट पर अंग्रेजी का जरा भी प्रयोग नहीं करना चाहता था। डाइनेमिक फोंट टेक्नालॉजी ऒर आईटी के क्षेत्र में हुए नए भाषायी परिवर्तनों से उत्साहित उस मित्र ने अपनी वेबसाइट के तमाम पन्नौ की सामग्री भी तैयार कर ली। सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था लेकिन जब उसने वेबसाइट का डोमेन नेम (इंटरनेट एक्सप्लोरर आदि ब्राउजर्स में लिखा जाने वाला वेबसाइट का नाम) पंजीकृत कराने का निश्चय किया तो उसका सामना अंग्रेजी से हो ही गया। कारण, तब वेबसाइट का नाम सिर्फ अंग्रेजी में ही हो सकता था। भले ही पूरी वेबसाइट हिंदी में हो, लेकिन नाम? माफ कीजिए, वह अंग्रेजी में ही होगा। 'अंग्रेजी की दासता के विरुद्ध' वेबसाइट बनाई जाए ऒर नाम अंग्रेजी में ही हो, उसे यह बात हजम नहीं हुई ऒर अंतत: वह परियोजना ठंडे बस्ते में डाल दी गई।

         लेकिन तब से विश्वव्यापी वेब बहुत आगे बढ़ चुका है, विशेषकर यूनिकोड की सफलता के बाद। अब आप अपनी वेबसाइट का नाम एस्की टेक्स्ट(अंग्रेजी ) में रखने के लिए अभिशप्त, या यूं कहें कि 'मजबूर' नहीं हैं। वैश्वीकृत डोमेन नाम(आईडीएन) प्रणाली के सफल परीक्षण हो चुके हैं ऒर अब आप गैर-अंग्रेजी भाषाऒं में डोमेन नेम रख सकते हैं। इसका अर्थ यह भी हुआ कि आप अपनी वेबसाइट का नाम अब एक से अधिक भाषाऒं में पंजीकृत करवा सकते हैं, जैसे कि(देवनागरी अक्षर में) हिंदुस्तानी.कॉम। विश्वव्यापी वेब को सही मायनों में विश्वानुकूल बनाने की दिशा में यह एक ऒर महत्वपूर्ण उपलब्धि है। ऐसा यूनिकोड टेक्नॉलॉजी की वजह से संभव हो पाया है क्योंकि यूनिकोड में हर भाषा के अक्षरों की अलग पहचान है।

         वेरीसाइन.कॉम, आलडोमेन्स.कॉम, इनरवाइज.कॉम, डायनाडोट.कॉम ऒर डोटअर्थ.कॉम आदि कंपनियां आज ३५० से अधिक भाषाऒं में वैश्वीकृत डोमेन नामों का पंजीकरण कर रही हैं, जिनमें हिंदी ऒर अन्य प्रमुख भारतीय भाषाएं भी शामिल हैं। वे सभी भाषाएं, जो यूनिकोड एनकोडिंग का समर्थन करती हैं। हमारा अपना डोमेन नेम एक्सटेंशन(.इन) भी जल्दी ही इस सुविधा का लाभ उठाने ऒर देने वाला है जिसकी शुरूआत हिंदी ऒर तमिल से होगी।

         अपनी भाषा में डोमेन नेम होने का अर्थ सिर्फ अंग्रेजी की अनिवार्यता से मुक्ति ही नहीं है। कोई भी व्यक्ति जिस भाषा का प्रयोग वार्तालाप, लेखन या कंप्यूटर कार्य के लिए करता है उसी के नामों को वह बेहतर याद रख सकता है। ऐसे नामों को समझना ऒर लिखना भी अधिक आसान है। किसी भी वेबसाइट का वास्तविक ऒर पूर्ण स्थानीयकरण (देसीकरण या हिंदीकरण कहें तो शायद ज्यादा उपयुक्त होगा ) तभी संभव है जब उसका प्रयोग करने के लिए कहीं भी अंग्रेजी भाषा का इस्तेमाल न करना पड़े।

         हिंदी वेबसाइटों के अंग्रेजी डोमेन नेम लिखते समय स्पेलिंग की गलतियां होना आम है। अपनी भाषा में नाम होना निश्चित रूप से अधिक अनुकूल लगेगा। कई बार किसी गैर-अंग्रेजी वेबसाइट के सही डोमेन नेम की जानकारी न होने पर उपयोगकर्ताऒं को सही वेबसाइट तक पहुंचने में बहुत मुश्किल होती है। खासकर तब, जब उससे मिलते-जुलते नामों वाली कई वेबसाइटें मौजूद हों। मिसाल के तौर पर प्रभासाक्षी को ही लीजिए। हिंदी में 'प्रभासाक्षी' लिखना बहुत आसान है लेकिन अंग्रेजी में हो सकता है कि कई लोग उसकी एकदम सटीक स्पेलिंग न लिख पाएं। बहुत से लोग हमें संपर्क कर बताते हैं कि आपकी वेबसाइट खुल ही नहीं रही थी। वास्तव में उन्होंने प्रभासाक्षी के डोमेन नेम को गलत रूप में लिखा होता है। बहुत सी वेबसाइटों के रोमन नाम पहले ही बुक हो चुके होते हैं ऒर तब आपको मजबूरन स्पेलिंग में थोड़ा सा बदलाव कर नाम पंजीकृत करवाना पड़ता है, मसलन इंडिया.कॉम के स्थान पर इन्ड्या.कॉम। लेकिन उस वेबसाइट पर जाने के इच्छुक व्यक्ति उसके सही रोमन नाम से ही वेबसाइट ढूंढ रहे होंगे। अपनी भाषा में नाम पंजीकृत होने पर यह समस्या समाप्त हो जाती है क्योंकि हिंदी में लिखते समय प्रभासाक्षी को आप प्रभासाक्षी ही लिखेंगे, 'प्रभसाक्षी' या 'प्रभासाक्षि' नहीं।

         अपनी भाषा में डोमेन नेम पंजीकरण की व्यवस्था उपलब्ध होने से हमें उन सभी डोमेन नामों का पंजीकरण कराने का अवसर भी मिल गया है जो अंग्रेजी में पहले ही बुक हो चुके हैं। विशेषकर जेनेरिक नामों (मसलन उद्योग.कॉम या साहित्य.कॉम) के मामले में तो यह एक बहुमूल्य अवसर है क्योंकि ऐसे डोमेन नेम मिल पानालगभग असंभव हो चुका है। हिंदी में फिलहाल ऐसे बहुत सारे नाम उपलब्ध हैं।

         आम तौर पर अंग्रेजी में पंजीकृत करवाए जाने वाले डोमेन नेम .कॉम, .नेट, .ऑर्ग, .इन्फो, .बिज, .एडु आदि टॉप लेवल डोमेन (टीएलडी ) श्रेणियों में आते हैं। इनके अतिरिक्त अब हर देश को भी अपना अलग टॉप लेवल डोमेन आवंटित हो गया है, जैसे भारत को .इन, अमेरिका को .यूएस ऒर पाकिस्तान को .पीए। यानी किसी भी नाम को पंजीकृत करवाने के लिए आपके पास इतने विकल्प उपलब्ध हैं। यदि आपका इच्छित नाम अपनी पसंदीदा टीएलडी श्रेणियों में पहले ही आवंटित हो गया है तो आपके पास अपने नाम की स्पेलिंग को तोड़-मरोड़कर इस्तेमाल करने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। लेकिन जरा सोचिए कि अंतरराष्ट्रीय डोमेन नेम व्यवस्था लागू होने के बाद आप वही नाम ३५० भाषाऒं में दर्ज करा सकते हैं, बिना स्पेलिंग में फेरबदल किए।

         सामान्य कंप्यूटर में अंतरराष्ट्रीय डोमेन नेम वाली वेबसाइटों को खोलने के लिए जरूरी है कि आपका वेब ब्राउजर इस सुविधा का समर्थन करे। इस तरह के ब्राउजर्स में इंटरनेट एक्सप्लोरर ७, नेटस्केप ७.१, मोजिला १.४, ऒपेरा ७.११ ऒर सफारी ब्राउजर्स में अंतरराष्ट्रीय डोमेन नेम वाली वेबसाइटों को आसानी से देखा जा सकता है। इन ब्राउजरों के पुराने संस्करणों में आप वेबसाइट के पते (एड्रेस ) सीधे अपनी भाषा में नहीं लिख सकते। असल में डोमेन नेम डालने पर संबंधित वेबसाइट तक पहुंचने की प्रणाल (डोमेन नेम रिजोल्यूशन) यूनिकोड आधारित नहीं बल्कि एस्की (पुरानी एनकोडिंग व्यवस्था जिसके तहत १२८ अंग्रेजी अक्षरों का प्रयोग किया जाता है) आधारित है। ब्राउजर की एड्रेस बार में यूनिकोड में लिखा गया वेब एड्रेस डालने पर वह पहले उसे पनीकोड (यूनिकोड एड्रेस का एस्की रूप) में परिवर्तित करता है ऒर फिर संबंधित वेबसाइट खोल देता है। लेकिन उपरोक्त ब्राउजर्स से पहले वाले इंटरनेट ब्राउजर्स में यह स्वत: परिवर्तन सुविधा उपलब्ध नहीं है। ऐसे ब्राउजरों में आईडीएन आधारित वेबसाइटों को खोलने के लिए आपको उनके यूनिकोड एड्रेस को पनीकोड में खुद रूपांतरित करना होगा। बाद में इस रूपांतरित वेब एड्रेस का इस्तेमाल कर आप पुराने ब्राउजर्स में भी आईडीएन आधारित वेबसाइट खोल सकेंगे।

         यदि आप अपना पसंदीदा डोमेन नेम पंजीकृत करवाने से रह गए हों तो यह मौका मत चूकिए। हो सकता है जो नाम अंग्रेजी में न मिले वह हिंदी में मिल जाए, या फिर गुजराती में।