खाडी के देशों में हिंदी का विकास
पूर्णिमा वर्मन

            हिंदी आज केवल भारत की भाषा नहीं है। नेपाल, पाकिस्तान, बांगलादेश और श्रीलंका में तो हिंदी बोली ही जाती है खाडी क़े देशों में से संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, ईराक व सऊदी में भी हिंदी रोज क़ी बोलचाल जैसी भाषा है । दुबई और शारजाह में धनी यूरोपीय और शासक वर्ग के अरबी लोगों को छोड दें तो लगभग हर व्यक्ति हिंदी बोलता और समझता है।

            दैनिक जरूरतों के काम करने वाले लोग जैसे घरों में काम करने वाली महिलाएं, टैक्सी ड्राइवर, घर की सफाई का काम करने वाले लोग, सब्जी बेचने वाले, सुपर मार्केट के कर्मचारी और सोने या कपड़े क़ी दूकानवाले सब हिंदी समझते और बोलते हैं। यह सच है कि इसमें से ज्यादातर भारतीय हैं लेकिन जो लोग भारतीय नहीं हैं या जो भारतीय है पर जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं है वे भी यहां हिंदी का प्रयोग करते हैं। उदाहरण के लिए श्रीलंकन महिलाएं जो घर की सफाई का काम करती हैं उनमें से निन्यानबे प्रतिशत हिंदी बोलती हैं। टैक्सी ड्राइवर भले ही अरबी हो पर वह हिंदी बोलना और समझना जानता है। अपने दस साल के प्रवास में मुझे शायद कभी एक टैक्सी ड्राइवर मिला होगा जो हिंदी नहीं जानता होगा। यही नहीं पुलिस अस्पताल हवाई अड्डे और डाकखाने जैसे सभी सरकारी कार्यालयों में लगभग सभी अरबी मूल के लोग हिंदी बोलते हैं।

            फिर भी हिंदी का विकास यहाँ एक बोली के रूप में हो रहा है । ज्ञान-विज्ञान साहित्य, संस्कृति और कला की समृद्ध भाषा के रूप में जो सम्मान उसको मिलना चाहिए था वह नहीं मिला है। वह प्रतिष्ठित लोगों की भाषा नहीं बन सकी है। हिंदी के नाटक, कवि सम्मेलन और फिल्मों को देखने जो आभिजात्य भीड़ उमडती है वह आपस में बातचीत के लिए भारतीयों की तरह अंग्रेजियत पर ही उतर आती है। इसका एक बहुत बड़ा कारण यह है कि स्वयं भारत के भीतर हम हिंदी को वह सम्मान नहीं दे सके हैं जो उसको मिलना चाहिए। इसी कारण भारतीय दूतावास भी या तो हिंदी के विकास का काम करते ही नहीं या बहुत ही ढीला-ढाला करते हैं ।

            इसकी तुलना में अगर हम विदेशी दूतावासों को देखें तो पता चलेगा कि वे अपनी भाषा के विकास के लिए कितना ज्यादा काम करते हैं। अगर आज विश्व में अंग्रेजी और फ्रेंच भाषाओं की इज्ज़त है तो वह इसलिए कि उस देश के लोग अपनी भाषा के विकास में जो जी-जान लगा रहे हैं उसके पीछे उन देशों की सरकारों का प्रबल सहयोग है। अगर हमें हिंदी के प्रेमी खाडी देशों में अपनी भाषा के विकास का काम करना है तो विदेशी दूतावासों से सबक लेना जरूरी है।

            ब्रिटेन तथा यूनाइटेड स्टेट्स की तरह खाडी क़े देशों में अरबी-हिंदी के संयुक्त प्रयासों को बढाने की जरूरत है। भारत के अनेक विश्वविद्यालयों में अरबी की स्नातक या स्नातकोत्तर पढाई की व्यवस्था है। लेकिन यू. ए. ई. के किसी भी विश्वविद्यालय में हिंदी स्नातक या परास्नातक कक्षाओं में नहीं पढाई जाती है। अगर यहां इसी प्रकार हिंदी की व्यवस्था हो जाए तो हिंदी और अरबी के समकालीन साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन की व्यवस्था हो सकती है। इस प्रकार की व्यवस्था दोनों देशों को साहित्यिक और सांस्कृतिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है।

            मैं बहुत सी ऐसी विदेशी महिलाओं से मिली हूँ जो गृहणियां है। वे खाली समय में हिंदी लिखना, पढना या बोलना सीखना चाहती हैं। अनेक यूरोपीय व अमरीकी छात्र-छात्राएं भारत-पर्यटन के लिए सामान्य हिंदी बोलने व लिखने-पढने की इच्छा रखते हैं। कपडों के उद्योग तथा अन्य कार्यों में लगी अनेक महिलाएं (पुरुष भी) हिंदी सीखना चाहते हैं ताकि वे अपने सहकर्मियों (जो अधिकतर हिंदी में बात करते हैं) के साथ हिंदी बोलने का मज़ा उठा सकें। हम इन सबके लिए विभिन्न स्तरों की हिंदी पढाए जाने की व्यवस्था कर सकते हैं। यह व्यवस्था दूतावास की ओर से हो सकती है या हिंदी संस्थाओं की ओर से या फिर शिक्षा संस्थाओं की ओर से। जिस प्रकार ब्रिटिश और फ्रेंच दूतावास अंग्रेजी और फ्रेंच कक्षाएं चलाते हैं और उनका धुआंधार विज्ञापन करते हैं ऐसी व्यवस्था भारतीय दूतावास से हिंदी के लिए होनी चाहिए।

            विदेशी दूतावासों में अपनी अपनी भाषा के अति संपन्न पुस्तकालय होते हैं। ब्रिटिश लायब्रेरी तो अंग्रेजी क़ी श्रेष्ठतम पुस्तकों के लिए हर जगह प्रसिध्द होती है। इसी के समकक्ष भारतीय दूतावास में एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का हिंदी पुस्तकालय होना चाहिए, जो अन्य पुस्तकालयों से कंप्यूटर द्वारा जुडा हो और अगर कोई पुस्तक पुस्तकालय में उपलब्ध न हो तो उसको एक हफ्ते के अंदर मंगा का दिया जा सके। इसके अतिरिक्त यहाँ किताबों की दुकान चलाने वाले लोगों को हिंदी पुस्तके व पत्रिकाएं बेचने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।

            इतनी शिकायतें लिखने का मतलब यह नहीं है कि यहां हिंदी के विकास के लिए कुछ नहीं हो रहा है. प्रवासी भारतीय परदेस जाकर हिंदी तथा भारत का महत्व अधिक गहराई से महसूस करता है। जब तक वह भारत में रहता है तो हिंदी तथा भारतीय संस्कृति उसके लिए घर की मुर्गी दाल बराबर होती है। विदेश में जाकर वहां की चकाचौंध के पीछे छिपी वास्तविकता को देखने के बाद, उसे हिंदी तथा हिंदी में अभिव्यक्त होने वाली भारतीय संस्कृति की याद आती है। इस समय वह हिंदी के विकास और जुडाव में लगता है। प्रवासी भारतीयों में ऐसे हजारों लोग खाडी क़े देशों में भी हिंदी के विकास में संलग्न हैं।

            यू. ए. ई. में हिंदी कार्यक्रमों का आयोजन करने वाली कई संस्थाएं हैं। ‘प्रतिबिंब’ नामक एक नाटक संस्था भी है जो 1996 से हर वर्ष एक हिंदी नाटक दुबई में खेलते रहे है। प्रतिबिंब नाम की इस अव्यवसायिक संस्था के अध्यक्ष महबूब हसन रिजवी साहब हैं। इस संस्था ने हिंदी की नाटयकला के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम किया है। इसके अतिरिक्त मेरी अपनी पत्रिकाओं अभिव्यक्ति व अनुभूति के चार अंक हर महीने प्रकाशित किए जाते हैं। इन अंकों को पुरालेखों में इस प्रकार व्यवस्थित किया गया है कि वे आज वेब पर हिंदी का सबसे बड़ा साहित्य कोश बन गए हैं।

            यू. ए. ई. में एफ. एम. के कम से कम तीन ऐसे चैनल हैं जिनपर चौबीसों घंटे हिंदी गाने समाचार और अन्य कार्यक्रम सुने जा सकते हैं। दिन भर इन पर अंतर्राष्ट्रीय उत्पादों के विज्ञापन सुने जा सकते हैं। यह इस बात का सबूत है कि हिंदी खूब लोकप्रिय है और अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां अपने माल बेचने के लिए हिंदी के महत्व को गंभीरता से महसूस करती हैं। व्यापार में इस प्रकार हिंदी की अंतर्राष्ट्रीय जरूरत को हिंदी की ताकत समझा जाना चाहिए।

            बहुत कम लोग जानते हैं कि वेब पर एक 'मध्यपूर्व हिंदी समिति' भी है। इस वेब साइट को कुवैत में रहने वाले जितेन्द्र चौधरी चलाते हैं। इसमें अपना खाता खोलने के बाद आप कोई भी महत्वपूर्ण लेख या सुझाव प्रकाशित कर सकते हैं। इसके जरिये मध्यपूर्व के लेखकों, शिक्षाविदों और हिंदी कर्मियों को जोडा जा सकता है। इस वेब समिति के अंतर्गत हम स्कूलों की अंतर्राष्ट्रीय कविता प्रतियोगिता या कहानी प्रतियोगिता आयोजित कर सकते हैं। इस समिति का कोई सदस्यता-शुल्क नहीं है।

            यू. ए. ई. में हिंदी लेखन के क्षेत्र में श्री कृष्ण बिहारी ने बहुत महत्वपूर्ण काम किया है. उन्होंने अरबी परिवेश को चित्रित करने वाली सौ से अधिक कहानियां लिखी हैं जो हंस से लेकर दैनिक जागरण तक लगभग हर पत्र पत्रिका में प्रकाशित हुई हैं। अनुवाद के क्षेत्र में कांता भाटिया ने डा मोती प्रकाश के संस्मरणों के हिंदी अनुवाद का महत्वपूर्ण काम किया है। इसके अतिरिक्त यदाकदा लिखने वाले और प्रकाशित होने वाले लेखक और कवि भी कई है जिनकी रचनाएं समय समय पर अभिव्यक्ति और अनुभूति की शोभा बढाती हैं।

            कुल मिला कर कहा जाए तो संभावनाएं बहुत है पर जिस शक्ति और श्रम के साथ काम करने की जरूरत है वह हम पूरी तरह जुटा नहीं पाए हैं।
('सृजनगाथा' से साभार)