परदेसी कंठ से फ़ूटकर निहाल हुई हिन्दी

भाषा का मिठास तब और बद जाता है जब वह सात समंदर पार से आए कंठों से फ़ूटती है इसका अहसास आज भारत भवन पहुंचे कला रसिकों को उस वक्त हुआ जब उन्होंने जापानी विशेषग्य प्रो. तोमिओ मिजोकामी को हिन्दी में बोलते हुये देखा ।

डा. यास्मीन नकवी की पुस्तक 'कविता की परछाई' का लोकार्पण भी हुआ। वे हिंदी अध्यापन का काम करती हैं।

     अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन द्वारा रविवार को आयोजित कार्यक्रम में प्रो. तोमिओ के सम्मान और डा. नकवी की किताब के लोकार्पण समारोह में राज्यपाल बलराम जाखड़ ने कहा कि प्रो. मिजोकामी और यासमीन मिलकर न सिर्फ हिंदी और जापानी भाषा के बीच सेतु का काम कर रहे हैं बल्कि वे दो संस्कृतियों और दो देशों के बीच भी सेतु बना रहे हैं।

     प्रो. तोमिओ ने हिंदी में सम्मान के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा 'भोपाल मेरे लिए नई जगह नहीं है यहां मेरे जापानी शिष्यों ने दो हिंदी नाटक मंचित किए हैं जिसमें भारत भवन में प्रदर्शन के दौरान मैं खुद भी उपस्थित था।' अभाभासा सम्मेलन के महासचिव सतीश चतुर्वेदी ने आमंत्रित अतिथियों का विस्तार से परिचय दिया। सम्मेलन के पदाधिकारी वीरेन्द्र सिंह, डा. मूलाराम जोशी, डीपी खन्ना और पंकज राग भी उपस्थित थे।

प्रचार के लिए फिल्मी गीत ही काफी
     'हिंदी के प्रसार प्रचार के लिए सरकार को कुछ करने की जरुरत नहीं है हिंदी फिल्में और इनके गीत यह काम सहजता से करने में सक्षम हैं।' प्रो. तोमिओ ने सिटी भास्कर से हिंदी में सहजता से बात करते हुए बताया कि परंपरागत तरीके से क्लास में भाषा सिखाना एक तपस्या है जबकि हिंदी गीत गुनगुनाते हुए भाषा सीखना मनोरंजन है। उन्हेंने कहा 'भारत में अध्ययन के दौरान हिदी फिल्मों ने हिंदी सीखने में मेरी बहुत मदद की थी।' उन्होंने बताया कि गीतों का जापानी अनुवाद करना आसान नहीं था। उनके शब्दों से 'मैंने न तो शब्दों का सीधी अनुवाद किया है और न ही भावार्थ, बल्कि बीच का रास्ता पकड़ा है और कोशिश की है कि अर्थ मूल शब्दों के निकट रहें' डा. यासमीन की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि उनके हिंदी और उर्दू दोनों के ज्ञान ने अनुवाद में मेरी बहुत मदद की। (दैनिक भास्कर, २८ अगस्त २००६ )