चुनॊंतियों के बावजूद सुनहरा है हिंदी का भविष्य
दिल्ली, १० नवंबर २००६। राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त किए दशकों गुजर जाने ऒर दुनिया के दूसरे सबसे अधिक आबादी वाले देश की अधिसंख्य जनता की ओर से बोली जाने वाली भाषा होने के बावजूद हिंदी आज भी विकास, सम्मान ऒर रोजगार देने वाली भाषा नहीं समझी जाती ऒर अंग्रेजी की तुलना में इसकी स्थिति दोयम दर्जे की बनी हुई है।
हिंदी के प्रचार प्रसार में जुटे सैंकड़ों संगठन ऒर सरकारी खजाने से करोड़ों रुपए फूंके जाने के बावजूद हिंदी आज अपना अधिकार हासिल नहीं कर पाई है ऒर इसकी महत्ता का गुणगान करने के लिए हर साल हिंदी दिवस ऒर हिंदी पखवाड़ों के आयोजन की रस्म अदायगी की जाती है। हिंदी की इस दुर्दशा के लिए कॊन जिम्मेदार है ऒर इसका भविष्य कैसा होगा, जैसे सवाल हर साल हिंदी दिवस पर उठाए जाते हैं ऒर अगले ही दिन ठंडे बस्ते में डाल दिए जाते हैं। हिंदी के विद्वानों, पत्रकारों ऒर अन्य बुद्धिजीवियों की राय में हिंदी की इस दुर्दशा के लिए राजनीतिक नेतृत्व जिम्मेदार है। उनकी राय में शिक्षा व्यवस्था ऒर रोजगार की नीतियों में बदलाव कर हिंदी को उसका स्थान दिलाया जा सकता है लेकिन इसके लिए राजनीतिक नेतृत्व को कडे ऒर निर्णायक फैसले लेने होंगे।
विद्वानों की राय में तमाम निराशाजनक स्थितियों के बावजूद हिंदी का भविष्य सुनहरा है ऒर वह अपना स्थान अवश्य हासिल करेगी। मुंबई के खालसा कालेज के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. टीएन राय ने हिंदी की दोयम दर्जे की स्थिति के लिए सरकारी नीति को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा है कि हिंदी को जो स्थान मिलना चाहिए था वह नहीं मिल पाया है ऒर उसकी जगह अंग्रेजी आज भी कुंडली मारकर बैठी हुई है। उन्होंने कहा कि हिंदी की स्थिति में सुधार के लिए शिक्षा व्यवस्था में बदलाव के साथ ही नेताओं के दृष्टिकोण को भी बदले जाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि जब तक इसमें परिवर्तन नहीं होता तब तक हिंदी को अपना अधिकार नहीं मिल सकेगा।
डॉ. राय ने कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हिंदी को संपर्क भाषा बनाना चाहते थे इसलिए हिंदी को बढ़ावा दिया गया लेकिन आजादी के बाद वह दृष्टि लुप्त हो गई ऒर वर्तमान में हिंदी ही नहीं अन्य भारतीय भाषाओं के स्कूलों की संख्या में भी भारी गिरावट आ रही है ऒर अंग्रेजी माध्यम के स्कूल कुकुरमुत्तों की तरह पनप रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह एक भ्रम है कि अंग्रेजी के बिना गति नहीं है। उन्होंने दुख व्यक्त किया कि हिंदी प्रदेशों की सरकारें भी अब अंग्रेजी को प्राथमिक शिक्षा में शामिल करने की बात कर रही हैं। उन्होंने अफसोस जताया कि हिंदी प्रदेशों में अब ऐसी धारणा बनती जा रही है कि विकास करना है तो अंग्रेजी को अपनाना होगा। उन्होंने इस स्थिति को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि हिंदी जो थोड़ी बहुत बढ़ रही है वह अपनी क्षमता ऒर शक्ति के दम पर।
उन्होंने कहा कि हिंदी के साथ ही भारतीय भाषाओं का भविष्य बनाना है तो अंग्रेजी को हटाना होगा। उन्होंने इसके लिए आम जन के जागरूक होने पर जोर दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ता ऒर सरकारी नौकरियों में काबिज एक खास वर्ग है जिसके हित अंग्रेजी से जुड़े हैं ऒर वह नहीं चाहता कि हिंदी को अपना स्थान मिले। उन्होंने कहा कि गांधीजी चाहते थे कि हिंदी को उसका हक मिले। उन्होंने कहा कि हिंदी को उसका हक मिलेगा तभी साधारण वर्ग को ऊपर उठने का अवसर मिलेगा। उन्होंने आशा जताई कि यह स्थिति ज्यादा दिन नहीं चलेगी ऒर हिंदी अपना स्थान पा ही लेगी। उन्होंने कहा कि सूचना क्रांति के इस दौर में हालात बदल भी रहे हैं ऒर संचार माध्यमों में हिंदी का प्रयोग होने लगा है। उन्होंने कहा कि बाजार के असर से ही सही हिंदी को बढ़ावा मिल रहा है।
मुंबई ऒर पुणे विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. चंद्रकांत बांदिवडेकर के अनुसार, सामान्य जनता हिंदी को अधिकाधिक अपना रही है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि लोकसभा में कई राज्यों के प्रतिनिधि अपने विचार हिंदी में व्यक्त करने लगे हैं भले ही वे शुद्ध भाषा में बात नहीं कर पाते हों। उन्होंने कहा कि एक जमाने में जहां दक्षिणी राज्यों में हिंदी का जबरदस्त विरोध हुआ करता था वहां भी अब हिंदी में व्याख्यान होने लगे हैं ऒर यदि ये व्याख्यान वहां की क्षेत्रीय भाषा में होते भी हैं तो उसका हिंदी में अनुवाद किया जाता है। उन्होंने कहा कि जनता अच्छी तरह समझती है कि हिंदी के बिना उसका काम नहीं चलने वाला लेकिन अर्थ के आधार पर शक्तिशाली उच्च वर्ग पश्चिम की अंधी नकल में अंग्रेजी को गले लगाए बैठा है। उन्होंने कहा कि यह गलत धारणा है कि अंग्रेजी शिक्षा के बिना प्रगति संभव नहीं। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाएं वैज्ञानिक प्रश्नों को सुलझाने में पूरी तरह सक्षम हैं लेकिन एक ऐसा वर्ग है जो अपने निहित स्वार्थों के लिए अंग्रेजी की वकालत करता है। उन्होंने कहा कि लॉर्ड मैकाले के इन्हीं अनुयायीयों की वजह से अंग्रेजी स्कूलों की संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि इस वर्ग के हाथ में आर्थिक नाड़ी है लेकिन जनता जल्दी ही इस छद्म को समझ जाएगी ऒर निकट भविष्य में भाषा को लेकर वर्ग संघर्ष छिड़ सकता है।
मुंबई हिंदी विद्यापीठ के उपकुलपति ऒर रॉयल कालेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. सीपी सिंह अनिल ने विश्वास के साथ कहा कि हिंदी का भविष्य सुनहरा है। उन्होंने कहा कि भारत में अपने उत्पाद बेचने के लिए आ रही बहुराष्ट्रीय कंपनियों को विवश होकर हिंदी ऒर अन्य भारतीय भाषाओं में विज्ञापन बनवाने पड़ रहे हैं भले ही वे लिखें रोमन लिपि में जाएं। डॉ. सिंह ने कहा कि आज के दौर में हिंदी के बल पर रोजगार पाना थोड़ा कठिन हो गया है लेकिन जब हिंदी के दम पर रोजगार मिलने लगेगा तो हिंदी की स्थिति ऒर मजबूत होगी। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि हिंदी के विद्वान डॉ. पी जयरामन जो अमेरिका में हिंदी विद्या भवन के प्रमुख हैं, वह भी धुर दक्षिणी प्रदेश तमिलनाडु से हैं।
उन्होंने कहा कि एक जमाने में जहां दक्षिण में हिंदी का विरोध होता था वहां अब हिंदी के कई विद्वान हैं। उन्होंने कहा कि मंत्रालयों, सचिवालयों ऒर हिंदी अधिकारियों के अधिकतर पदों पर बैठे दक्षिण के लोग हिंदी के बहुत अच्छे ज्ञाता हैं। उन्होंने दुख के साथ कहा कि हिंदी की दुर्दशा तो असल में हिंदी प्रदेशों में हो रही है। डॉ. सिंह ने कहा कि यह एक भ्रम है कि हिंदी मान, सम्मान ऒर नौकरी नहीं दिला सकती। उन्होंने कहा कि हिंदी का विरोध सिर्फ राजनीतिक वजह से हो रहा है ऒर साहित्य से इसका कोई लेना-देना नहीं है।
उन्होंने कहा कि समूचे देश में ही नहीं विश्व के कई विश्वविद्यालयों में आज हिंदी पढ़ाई जाती है। उन्होंने कहा कि मारीशस, फीजी, सूरीनाम जैसे देशों में हिंदी का प्रयोग काफी बढ़ा है ऒर वहां हिंदी के कई अच्छे विद्वान हैं। उन्होंने कहा कि राजनीतिज्ञों के निहित स्वार्थों के कारण हिंदी हमारे देश में पिछड़ रही है। उन्होंने श्यामसुंदर दास की उक्ति का उदाहरण देते हुए ठोस आशावादी लहजे में कहा कि हिंदी दूब की तरह है ऒर उस पर चाहे जितना बड़ा पत्थर रख लीजिए वह धीरे-धीरे अपनी शाखाएं फैलाकर फलेगी फूलेगी।
हिंदी सांध्य दैनिक मुंबई टाइम्स के संपादक राकेश शर्मा ने हिंदी की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए दो टूक शब्दों में कहा कि हिंदी की गरिमा घटी है। उन्होंने कहा कि हिंदी के न तो पाठक गंभीर है ऒर न ही लेखक। उन्होंने कहा कि हिंदी राष्ट्रभाषा तो है मगर इसे लेकर राष्ट्रीय चेतना का अभाव नजर आता है। उन्होंने कहा कि हिंदी को लेकर जिस प्रकार की चेतना भारतेंदु के दौर में थी वह आजादी के बाद धीरे-धीरे खत्म होती गई। उन्होंने स्पष्ट कहा कि आज के दौर में अंग्रेजी का वर्चस्व ऒर मजबूत हुआ है ऒर हिंदी की महत्ता घटी है।
उन्होंने हिंदी के अखबारों के संदर्भ में कहा कि पाठकों की संख्या तो बढ़ी है ऒर हिंदी अखबारों का फैलाव भी हुआ है मगर चेतनाहीन होने के कारण इसका प्रभामंडल कम हुआ है ऒर हिंदी में कही गई बात को गंभीरता से नहीं लिया जाता। वरिष्ठ पत्रकार ऒर शायर श्री शर्मा ने दुख भरे शब्दों में कहा कि हमारा विकास का मॉडल आज भी उपनिवेशवाद पर आधारित होने के कारण हिंदी रोजगार ऒर सम्मान देने वाली भाषा नहीं बन पाई है। उन्होंने कहा कि यदि इसे लेकर पूरी व्यवस्था में परिवर्तन नहीं होता है तो हिंदी की दुर्गति जारी रहेगी। उन्होंने कहा कि हिंदी जनता की भाषा तो बनी है मगर विकास ऒर सम्मान पाने की भाषा नहीं बन पाई। उन्होंने कहा कि यही वजह है कि हमारा तथाकथित आर्थिक विकास तो हो रहा है मगर सांस्कृतिक विकास नहीं हो पा रहा है।
दैनिक नवभारत टाइम्स के वरिष्ठ पत्रकार भुवेन्द्र त्यागी के अनुसार, १९५० में जब संविधान लागू हुआ उसी समय अंग्रेजी को पूरी तरह हटाकर हिंदी को लागू किया जाता तो आज स्थिति कुछ अलग ही होती। लेकिन ऐसा हुआ नहीं ऒर यह तय हुआ कि १५ साल तक हिंदी ऒर अंग्रेजी दोनों रहेगी ऒर फिर स्थिति की समीक्षा के बाद अंग्रेजी को हटाने के बारे में निर्णय लिया जाएगा। श्री त्यागी ने कहा कि १९६५ में जब समीक्षा की गई तब निष्कर्ष यह निकला कि अंग्रेजी को फिलहाल हटाया नहीं जा सकता। नतीजा यह हुआ कि अंग्रेजी हमेशा के लिए जम गई। उन्होंने कहा कि जब देश आजाद हुआ उस समय लोगों में राष्ट्रभक्ति ऒर राष्ट्रभाषा की भावना प्रबल थी ऒर यदि उसी समय अंग्रेजी को हटाकर पूरी तरह हिंदी को लागू कर दिया जाता तो आज हिंदी की स्थिति कुछ ऒर ही होती।
उन्होंने हिंदी के भविष्य के प्रति आशावादी नजरिया अपनाते हुए कहा कि आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने उत्पाद बेचने के लिए हिंदी में विज्ञापन बनवा रही हैं। उन्होंने कहा कि आज अधिकतर बच्चे अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहे हैं ऐसे में कुछ साल बाद हिंदी जानने वालों की मांग ऒर बढ़ जाएगी। उन्होंने कहा कि आज के बदलते युग में अंग्रेजी सीखना जरूरी है तो इसके सीखने में कोई बुराई नहीं मगर इसका प्रयोग घर ऒर बाहर के अलग-अलग कपड़ों की तरह होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार घर के कपड़ों को बाहर ऒर बाहर के कपड़ों को घर में पहनकर नहीं सोया जाता उसी प्रकार हिंदी ऒर अंग्रेजी का प्रयोग अलग-अलग कार्य के लिए किया जा सकता है। दैनिक नवभारत के वरिष्ठ पत्रकार द्विजेंन्द्र तिवारी ने हिंदी की दुर्दशा के लिए राजनीतिक नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि जब रूस, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन ऒर चीन जैसे देश अपनी भाषा अपनाकर तरक्की कर सकते हैं तो भारत को विकास के लिए अंग्रेजी की बैसाखी की क्या जरूरत। उन्होंने अफसोस जताया कि हिंदी की खाने वाले लोग भी आज अंग्रेजी के प्रयोग को अपनी शान समझते हैं।(प्रभासाक्षी से साभार)