विज्ञान सम्बन्धी शोध-कार्य स्वदेशी भाषाओं में छपें
करनाल, ३० अगस्त, ०६। भारत एक कृषि प्रधान देश है। परन्तु यह दुख की बात है कि भारत के किसान बड़ी संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं। आश्चर्य इस बात का है कि चीन की आबादी भारत की आबादी से ज्यादा है फिर भी वहां के किसान आत्महत्या नहीं करते। इसका मुख्य कारण यह है कि चीन के वैज्ञानिक जो भी शोध-कार्य करते हैं वे उसे चीनी भाषा में लिखकर अपने देश के किसानों तक पहुंचाते हैं और वहां के किसान नवीनतम शोध-ज्ञान के द्वारा अपने खेतों तथा पशुओं का उत्पादन पढ़ाते हैं और सुखी जीवन जीते हैं, परन्तु भारत में जो भी शोध-कार्य होता है वह केवल अंग्रेजी भाषा में ही छपता है, जिसका लाभ भारत के किसानों को नहीं मिल पाता। अत: देश समस्त शोध-कार्य हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं में भी छपना चाहिए। यह निवेदन भारतीय कृषि अनुसंधान समिति के संस्थापक रामेश्वर दयाल गोयल ने भारत के राष्ट्रपति को प्रेषित एक पंजीकृत पत्र द्वारा किया है।
श्री गोयल ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि विश्व के १४६० जर्नल्स की सूची में हिन्दी का एक भी जर्नल नहीं है। इतना ही नहीं जिन वैज्ञानिकों के शोध-पत्र अमरीका, इंग्लैण्ड, कनाडा, आस्ट्रेलिया व न्यूजीलैण्ड के जर्नल्स में छपते हैं उन्हें उच्च कोटि का वैज्ञानिक तथा जिन वैज्ञानिकों के शोध-पत्र भारत में अंग्रेजी के जर्नल्स में छपते हैं उन्हें निम्न-कोटि का वैज्ञानिक समझा जाता है। इतना ही नहीं यदि कोई वैज्ञानिक अपना शोध-कार्य हिन्दी में लिखता है तो उसके साथ पदोन्नति के समय भेद-भाव की नीति अपनाई जाती है और अंग्रेजी में शोध-कार्य लिखने वाले वैज्ञानिकों को वरीयता दी जाती है। जिससे वैज्ञानिक हिन्दी में शोध-कार्य करने से डरते हैं। और इस तरह भारत के किसानों को उनके शोध-कार्यों का कोई लाभ नहीं मिल पा रहा।
उन्होंने अपने पत्र में लिखा है कि भारत के कृषि-शोध कार्य पर देश का पैसा भारत के किसानों के नाम पर खर्च किया जा रहा है और उसका लाभ विदेशी उठा रहे हैं। क्यों कि जो शोध-कार्य विदेशों के जर्नल्स में छपता है, उसके आधार पर विदेशी कंपनियां अपने उत्पाद एवं बीज तैयार कर भारत में काफी कीमतों में बेचती है और किसानों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। भारत का गरीब किसान मंहगे उत्पाद एवं बीज को खरीदने में सक्षम नहीं होने के कारण ही भारत के खेतों की उपज-क्षमता घटती जा रही है और यदि किसान उनका उपयोग बैंक से कर्ज लेकर करता है तो वह अपने परिवार का पालन-पोषण न कर पाने एवं बैंक से लिये गये ऋण को चुका नहीं पाने के कारण आत्महत्या करने को विवश हो जाता है।
उन्होंने
लिखा है कि अंग्रेजी में इतनी क्षमता नहीं है कि वह देश के किसानों को इस योग्य
बना सके जो वैज्ञानिकों द्वारा अंग्रेजी में लिखे शोध-कार्यों को पढ़ व समझ सकें।
यह क्षमता केवल स्वदेशी भाषाओं में ही है। अत: देश की शिक्षा तथा विज्ञान लेखन
से अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त की जाये ताकि भारत के वैज्ञानिकों के साथ हिन्दी
में शोध-कार्य लिखने से जो भेदभाव हो रहा है वह समाप्त हो सके एवं भारत भी स्वदेशी
भाषाओं द्वारा चीन की तरह चहुमुखी विकास कर सके।